shikhar dhawan ki wife

 shikhar dhawan ki wife

shikhar dhawan ki wife

 शिखर धवन और उनकी wife या 
शिखर धवन और आदमियो के लिए कानून या 
आलोक मौर्य और ज्योति मौर्य या 
आलोक मौर्य और उनके अधिकार 

 ये सब पढ़कर आपको कानून का नाम कम और fake feminism का नाम ज्यादा याद आएगा, चलिये इनके बारे मे बात करते है । 

 1.  What is fake feminism??-

Feminism की परिभाषा आपको काफी जगह मिल जाएगी मे आपको उदाहरण बताती हूँ , suppose एक लड़की है जो पढ़ाई कर रही है अपने घर की जिम्मेदारियाँ उठा रही है आर्थिक रूप से घर को मजबूत बनाने का try कर रही है,

  दूसरी लड़की,  उसके घर मे क्या हो रहा है उसे कुछ नहीं पता लेकिन social media पर आकर feminism feminism बोलकर उसे लोगो की respect मिलने लगी है, 
 तीसरी लड़की अपने मर्ज़ी के कपड़े पहनना चाहती है,  अपने आस पास के लोगो के comfort की परवाह बिना और उसकी इसी तरह की और भी ख्वाहिशे है जिसमे family के लोगो का कोई ख्याल नहीं बस feminism का नाम है justify करने के लिए । 
तीनों मे से आपको कौनसा example feminism का लगता है और कौनसा fake feminism का ?? 

2.  Fake feminism की वजह से opposite gender को होने वाले नुकसान- 

 ऊपर जो cases बताए है उन दोनों cases मे एक common factor है कि दोनों मे ही आदमियो के साथ नाइंसाफी करने वाली औरते है और दोनों ही case मे इन दोनों औरतों ने जो गलत किया शिखर धवन और आलोक मौर्य के साथ उसकी उन्हे कोई सज़ा नहीं मिलेगी, अंत मे सिर्फ तलाक होगा और कुछ नहीं, ज्यादा से ज्यादा मानहानी का case कर सकते है पर भारत मे किसी महिला से सताया हुआ इंसान उस पर मानहानी का case करने से पहले 2 बात सोचेगा
 पहला तो ये कि उसे बस उस औरत से कानूनी तौर पर अलग होने का हक मिल जाए वो ही बहुत है 
दूसरा किसी औरत के खिलाफ अगर आप कानूनी लड़ाई लड़ रहे है खासकर कोई आदमी तो उसके दिमाग मे हमेशा ये बात रहती है कि पता नहीं कौनसी बात पर औरतों के लिए बनाए गए कानून का गलत इस्तेमाल कर दिया जाए उस पर। 

3.  ऐसे cases मे क्या किया जा सकता है ??-

 ऐसे cases मे feminism से related संस्थाओ को आगे आकार victim के लिए आवाज़ जरूर उठानी चाहिए, Fake feminism से समाज मे जो बुरा असर पढ़ रहा है संस्थाओ के इस कदम से ये problem सही करने की कोशिश की जा सकती है , ताकि वो जिस feminism की वो बात करते है जो औरत को मर्द के बराबर हक देने की बात करता है वो सार्थक हो सके क्योकि अगर मर्द औरत दोनों बराबर है तो victim भी दोनों मे कोई भी हो सकता है और गलती की सज़ा भी दोनों gender के लिए बराबर होनी चाहिए जबकि अभी तो कानून का पडला पूरी तरह से औरतों की तरफ झुका हुआ है जबकि अगर औरतों को बराबरी चाहिए तो कानून भी बराबर होने चाहिए।

 आलोक मौर्य और शिखर धवन ने जो mentally harassment झेला है उसकी भरपाई कौन करेगा इस बात का जवाब न तो किसी कोर्ट के पास है, ना कानून कि किसी किताब के पास है , ना किसी organization के पास और न ही feminism के नारे लगाने वालों के पास क्योकि कानून मे जितने भी कानून औरतों कि सुरक्षा के लिए बनाए गए है वो एक तरफा बना दिये गए, मतलब इन कानूनों के अनुसार victim हमेशा एक औरत हो होगी और ऐसे cases मे feminism कि बात करने वाले कभी दिखाई नहीं देते है और इसका बहुत बुरा असर समाज पर पड़ता है ।

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